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उपभोक्ता संरक्षण कानून की सार्थकता निर्धन/अक्षम उपभोक्ता को इस कानून का लाभ प्रदान करने में निहित है। ऐसे निर्धन/अक्षम उपभोक्ता जो कि उपभोक्ता संरक्षण कानून की प्रक्रिया से अनभिज्ञ हैं और परिवाद पर होने वाला खर्च वहन करने में असमर्थ हैं, उन्हें निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध करानी है।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये निर्धन/अक्षम उपभोक्ताओं के लिये विधिक सहायता को एक योजना तैयार की गई है। एक चिन्हित स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठन को इस योजना के लिये 10 हजार रुपये की राशि उपलब्ध कराई जा रही है। इस राशि में से स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठन प्रत्येक प्रकरण के लिये अधिकतम रूप से 300 रुपये की विधिक सहायता संबंधित वकील को पारिश्रमिक एवं अन्य व्यय के लिए भुगतान करेगा। प्रकरण में निर्णय होने पर यदि निर्णय उपभोक्ता के पक्ष में होता है तो उपभोक्ता को क्षतिपूर्ति एवं वाद खर्च के रूप में जो राशि अप्रार्थी से प्राप्त होगी उस राशि में से स्वैच्छिक संगठन अपने द्वारा व्यय की गई राशि उपभोक्ता से प्राप्त कर रसीद देंगे और इस प्रकार स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठन के पास इस योजना के मद में रिवोल्विंग फण्ड बन सकेगा।

संबंधित स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठन द्वारा उपभोक्ता को उपलब्ध कराई गई सहायता के संबंध में निम्नलिखित विवरण संधारित किया जावेगाः-

  1. उपभोक्ता मंच का नाम,
  2. उपभोक्ता का नाम,
  3. परिवाद प्रस्तुत करने की दिनांक,
  4. परिवाद का सार,
  5. दी गई फीस की राशि,
  6. उपलब्ध कराई गई कुल विधिक सहायता की राशि,
  7. परिवाद का निर्णय होने पर निर्णय की दिनांक व निर्णय का सार,
  8. निर्णय की छाया प्रति प्राप्त कर संगठन द्वारा अभिलेख में रखी जायेगी।
  9. किसी भी मामले में रुपये 300/- से अधिक की विधिक सहायता स्वीकृत नहीं की जायेगी।
  10. इस संबंध में व्यय राशि का मानचित्र संगठन द्वारा प्रति माह जिला रसद अधिकारी को प्रेषित किया जावेगा।
  11. व्यय राशि के संबंध में मूल वाऊचर व अन्य अभिलेख संस्था के कार्यालय में सुरक्षित रखे जायेंगे और विभागीय अधिकारियों को निरीक्षण हेतु मांगने पर तत्काल उपलब्ध कराये जायेंगे। उपलब्ध कराई गई राशि अन्य कार्यों पर व्यय नहीं की जावेगी।
  12. निर्णय परिवादी के पक्ष में होने पर मंच द्वारा दिलाई गई क्षतिपूर्ति की राशि में से संगठन द्वारा दी गई विधिक सहायता का पुनर्भरण किया जावेगा। ऐसी राशि के संबंध में संगठन द्वारा मंच/परिवादी को राशि जमा होने के बाद रसीद दी जावेगी और इसका पृथक से लेखा संधारित किया जावेगा।